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उदारवादी सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? उदारवादी के प्रमुख सिद्धांत क्या हैं?What are the main principles of liberalism?- The Sky Journal

उदारवादी सिद्धांत से आप क्या समझते हैं? उदारवादी के प्रमुख सिद्धांत क्या हैं?

उदारवादी सिद्धांत

उदारवादी सिद्धांत के सभी वृत्तांतों का केंद्र बिंदु स्वतंत्रता ही है। हालाँकि, स्वतंत्रता के संदर्भ को उदारवादी चिंतकों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। जैसा कि एक लेखक ने कहा है, उदारवादी राजनीति का एक सिद्धांत है जो सबसे पहले लोकनीति निर्माण में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देता है। स्वतंत्रता, इस अर्थ में, अवरोधों से स्वतंत्रता दिलाना है, विशेषकर एक अधिनायकवादी राज्य के द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से मुक्ति दिलाना या उससे स्वतंत्र होना है। वास्तव में यह विचारों का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है) बल्कि यह एक बौद्धिक आंदोलन है जो नई स्थितियों और चुनौतियों का सामना करने के लिए नए विचारों को समाहित करता है। बैरी (1995) के अनुसार उदारवादी स्पष्टीकरण और मूल्यांकन दोनों स्वीकार करता है और अपनाता है। इसका विश्लेषणात्मक संबंध घटनाओं के उस क्रम से है जिसको हम सामाजिक व्यवस्था के नाम से जानते हैं और जिसमें आर्थिक, विधिक और राजनीतिक परिघटनाएँ शामिल होती हैं। उदारवादी के मत में राज्य एक आवश्यक बुराई है। उदारवादी राज्य को एक साधन के रूप में देखता है और व्यक्ति को साध्य के रूप में यह राज्य की अबाध सत्ता को स्वीकार्य नहीं करता है। 
       जॉन लॉक का मानना है कि उदारवादी मुख्य रूप से निम्नलिखित विश्वासों / सिद्धांतों पर आधारित हैं :–

■ पुरुष / महिला एक तार्किक रचना है।
■ व्यक्ति के अपने हित और सामान्य हित में कोई मूल विरोधाभास नहीं है।
■ पुरुष / महिला का जन्म कुछ प्राकृतिक अधिकारों के साथ होता है, जिनका कोई भी सत्ता / प्राधिकारी अतिक्रमण नहीं कर सकता है।
■ नागरिक समाज और राज्य कृत्रिम संस्थाएँ हैं जिनको व्यक्ति ने सामान्य हित के संरक्षण या सेवा के लिए बनाया है।
■ उदारवादी साध्य बनिस्पत उत्पाद की प्राथमिकता में विश्वास करता है। सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ठीक प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतंत्रता, समानता, न्याय और लोकतंत्र की खोज का उदारवादी विचार/सिद्धांत है।
■ उदारवादी व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रताओं को उन्नत करता है जिसमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता संस्थान संस्था बनाने की स्वतंत्रता, आवागमन या गतिविधियों का अधिकार सम्मिलित है तथा कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया को कठोरता से लागू करना है।
            व्यक्तिवाद और उपयोगितावाद दो ऐसे दिशा-निर्देश हैं जिनके अनुसार उदारवादी सिद्धांत का विकास हुआ है। व्यक्तिवाद व्यक्ति पर एक तार्किक रचना के रूप में प्रकाश डालता है। इसके आवश्यक तत्त्व हैं- व्यक्ति की प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता की मौजूदगी और निर्णय को संपूर्ण मान्यता दी जानी चाहिए, जब लोकनीति का निर्माण किया जाए और निर्णय लिए जाएँ। जॉन लॉक और एड्म स्मिथ इसके आरंभिक प्रवर्तक हैं। बेंथम और मिल उपयोगितावाद के समर्थक हैं। उपयोगितावाद का मानना है कि अधिकतम संख्या के लोगों के सुख व खुशियों का ध्यान रखना आवश्यक है। इसके अंतर्गत कुछ लोगों के हितों को बहुसंख्यक के हितों के लिए दरकिनार किया जा सकता है।

उदारवादी सिद्धांत के चिंतक : 

उदारवादी की प्रारंभिक व्याख्या करने वालों में जॉन लॉक (1632-1704), एडम स्मिथ (1723-90) और जेरेमी बैंथम (1748-1832) के नाम उल्लेखनीय हैं। लॉक को उदारवादी के जनक के रूप में जाना जाता है, एड्म स्मिथ को अर्थशास्त्र और राजनीतिक अर्थशास्त्र के जनक और बेन्थम को उपयोगितावाद के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। ये सभी विद्वान अहस्तक्षेप (laissez-faire) सिद्धांत के समर्थक हैं, जिसमें व्यक्ति की आर्थिक गतिविधियों में राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप के सिद्धांत को स्थापित किया गया है। वे पुरातन उदारवादी के संस्थापक हैं, जिसको नकारात्मक उदारवादी भी कहते हैं, क्योंकि यह व्यक्ति के आपसी क्रियाकलाप के क्षेत्र में राज्य के विरुद्ध भूमिका की परिकल्पना करते हैं। लॉक सहिष्णुता और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल केंद्रित करते हैं। बेंथम बाजार अर्थव्यवस्था और राज्य की गतिविधियों के क्षेत्र में प्रतिबंध लगाने पर जोर देते हैं । मिल उपयोगितावाद के विचार में संशोधन करने के पक्ष में हैं और सामान्य कल्याण को उन्नत करने के लिए राज्य की गतिविधियों में विस्तार करने के पक्ष में दावेदार थे। उन्होंने व्यक्ति की स्वतंत्रता को उन्नत करने के लिए राज्य की भूमिका को अहम् बताया है। राज्य की भूमिका सकारात्मक बताई गई है।
          जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-73) ने दार्शनिक आधार पर उपयोगितावाद और अहस्तक्षेप के सिद्धांत को संशोधित करने का समर्थन किया है, ताकि कल्याणकारी राज्य के सिद्धांत के लिए मार्ग सरल बन जाए। इसके पश्चात् टी. एच. ग्रीन (1836-82) ने उदारवादी के सिद्धांत में नैतिक आयाम को सम्मिलित करने के लिए कहा है ताकि कल्याणकारी राज्य का सिद्धांत उन्नत होकर संपूर्णता को प्राप्त हो सके। राजनीतिक क्षेत्र में उदारवादी लोकतंत्र को विकसित करने में सहयोग देता है और आर्थिक क्षेत्र में यह पूँजीवाद को बढ़ावा देने का काम करता है। उदारवादी, सामान्यतः लाभदायक चयन करने और उसकी जिम्मेदारी लेने की व्यक्ति में योग्यता बनाने में विश्वास करता है। यह महत्त्वपूर्ण है कि उदारवादी द्वारा व्यक्तिवाद पर विशेष ठोस इम्मेन्युअल कैन्ट की ओर से बौद्धिक बचाव पक्ष मिला है जो रूसो से प्रभावित थे। उन्होंने व्यक्ति की स्वायत्तता के लिए स्पष्ट सिद्धांत की रचना की है। कैन्ट की स्वायत्तता इस अर्थ में समझी जानी चाहिए कि व्यक्ति बाहर के हस्तक्षेपों से मुक्त होता है जैसे कि अवपीड़न या दबाव, धमकी उनका मानना है कि किसी भी महिला या पुरुष की इच्छा आंतरिक दबावों से मुक्त होनी चाहिए (मनोभाव और पूर्वाग्रहों से) और उसे तर्कों के आधार पर ही कार्यरत रहना चाहिए।
         उदार परंपरा को साकार रूप प्रदान करने में लौक, केन्द्र और मिल, ये तीनों चिंतक बहुत महत्वपूर्ण हैं। समकालीन उदारवादी इनसे बहुत प्रभावित रहा है। बीसवीं शताब्दी में सबसे अधिक गहन उदारवादी चिंतक जॉन रॉल्स रहे हैं जिन्होंने उदारवादी के गहन चिंतन में सहयोग दिया है। रॉल्स के उदारवादी का मुख्य केंद्र उनका राजनीतिक विचार है जिसमें कहा गया है कि नागरिक अपनी इच्छानुसार मुक्त रूप से चयन करने या उसके मूल्यों व साध्य के अनुसार जीने का अधिकारी है। रौल्स द्वारा दो महान् कृतियों का लेखन किया गया है ए थ्योरी ऑफ जस्टिस (1975) एवं पॉलिटिक्ल लिबरलिज्म (1993)। इनमें समकालीन वाद-विवाद और परिचर्चा शामिल हैं जो उदारवादी और उसके मूल्यों पर आधारित है।

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