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भारत में बाबर के आगमन का महत्त्व | Significance of Babur's arrival in India in Hindi


भारत में बाबर का आगमन अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद काबुल और कंदहार पहली बार उत्तर भारत पर आधारित एक साम्राज्य के अभिन्न अंग बने। ये क्षेत्र भारत पर आक्रमण के लिए हमेशा एक तैयारी के मैदान जैसा काम करते आए थे। इसलिए उन पर अधिकार जमाकर बाबर और उसके उत्तराधिकारियों ने लगभग 200 वर्षों तक भारत को बाहरी हमलों से सुरक्षित रखा। आर्थिक दृष्टि से भी काबुल और कंदहार के नियंत्रण ने भारत के विदेशी व्यापार को बल पहुँचाया क्योंकि ये दो नगर पूरब में चीन और पश्चिम में भूमध्यसागरीय बंदरगाहों तक जानेवाले काफ़िलों के प्रस्थानबिंदु होते थे। इस तरह एशिया पार के विशाल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी।

मध्य और पश्चिमी एशिया की राजनीतिक स्थिति कुल मिलाकर शांति और स्थायित्व की स्थिति थी, हालाँकि युद्ध और खूनखराबे होते रहते थे। इस स्थिति में मध्य एशिया के मामलों में एकजुट भारत का आर्थिक और कूटनीतिक हस्तक्षेप लाजमी तौर पर पहले से बढ़ा। बाबर और उत्तराधिकारियों की हार्दिक इच्छा अपने वतन फरगाना को फिर से पाने की थी। इसके कारण भी भारत मध्य एशिया के विकासक्रमों पर गहरी नजर रखता रहा। इस तरह तेरहवीं सदी के तुर्क सुल्तानों के काल के विपरीत भारत को अब महाद्वीपीय एशिया की राजनीति का अभिन्न अंग माना जाने लगा।

उत्तर भारत में बाबर ने लोदियों और राणा साँगा के नेतृत्व वाले राजपूत महासंघ की शक्ति को चूर कर दिया। इस तरह उसने इस क्षेत्र में मौजूद शक्ति-संतुलन को भंग कर दिया। यह एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की दिशा में बड़ा कदम था। पर इसको अंजाम देने से पहले और भी अनेक शर्तों को पूरा किया जाना आवश्यक था।

बाबर ने भारत को युद्ध की नई शैली से परिचित कराया। भारत में बारूद का ज्ञान तो पहले भी था, पर बाबर ने दिखाया कि तोपखाना और सवार सेना का कुशल समन्वय क्या-क्या कर सकता है। उसकी जीतों के कारण भारत में बारूद और तोप तेजी से लोकप्रिय हुए। चूँकि तोपखाना रखना बहुत खर्चीला होता था. इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ़ वही शासक कर सकते थे जिनके पास पर्याप्त संसाधन हों। इस तरह छोटे रजवाड़ों का युग समाप्त हो गया।

अपनी नई सैन्य विधियों और अपने निजी आचरण के द्वारा बाबर ने फ़िरोज़ तुगलक की मौत के बाद से ही कम होती जा रही ताज की प्रतिष्ठा को पुनः बहाल किया। हालाँकि सिकंदर लोदी और इब्राहीम लोदी ने ताज की प्रतिष्ठा बहाल करने की कोशिश की थी, पर स्वतंत्रता और समानता के अफ़गान विचारों के कारण इसमें आंशिक सफलता ही मिली थी। बाबर की प्रतिष्ठा एशिया के दो सबसे मशहूर योद्धाओं, चंगेज़ और तैमूर के वंशज के रूप में थी। इसलिए उसका कोई भी अमीर न तो उसकी बराबरी का दावा कर सकता था और न उसके तख्त की कामना कर सकता था। उसकी स्थिति को चुनौती अगर मिलती भी तो किसी तैमूरी शासक या उसके वंशज से ही मिलती।

बाबर के निजी गुणों ने उसे उसके बेगों का प्यारा बनाया। वह हमेशा अप सैनिकों के साथ मुसीबतें झेलने को तैयार रहता था। एक बार कड़कड़ाते जाड़े में बाबर काबुल लौट रहा था। बर्फ़ इतनी गहरी थी कि घोड़े उसमें फँस जाते और सैनिक दलों को बर्फ़ को कूटना पड़ता जिससे कि घोड़े गुजर सकें। बिना हिचक बाबर भी इस कमरतोड़ काम में जुट गया। बाबर को ऐसा करता देखकर उसके बेग भी इस काम में शामिल हो गए।

बाबर शराब और अच्छी सोहबत का शौकीन था। खुद उसकी सोहबत भी बड़ी खुशदिल होती थी। साथ ही वह कठोर अनुशासनवादी और सख्त काम लेने वाला भी था। वह अपने बेगों का बहुत ध्यान रखता था और जब तक वे बेवफाई नहीं करते थे, उनके अनेक दोषों को वह नज़रअंदाज़ कर देता था। वह अपने अफ़गान और भारतीय अमीरों के प्रति भी यही रवैया अपनाने को तैयार रहता था। लेकिन उसके स्वभाव में कुछ बेरहमी भी थी जो संभवतः उसे पूर्वजों से मिली थी। अनेक अवसरों पर उसने अपने विरोधियों की खोपड़ियों की मीनारें बनाईं। लेकिन निजी बेरहमी की इन तथा ऐसी ही दूसरी मिसालों को उस निर्मम दौर के संदर्भ में देखना होगा जिसमें बाबर रह रहा था।

बाबर रूढ़िवादी सुन्नी था पर वह धर्माध नहीं था। न ही वह इस्लाम के धर्माचार्यों से प्रेरित होता था। जब ईरान और तूरान में शियों और सुन्नियों के बीच भयानक पंथगत लड़ाइयाँ होती थीं, तब भी उसका दरबार धार्मिक और पथिक टकों से मुक्त था। उसने साँगा से लड़ाई को जिहाद ठहराया और जीतने के बाद जो की उपाधि धारण की, पर इसके स्पष्ट रूप से राजनीतिक कारण थे। यद्यपि उसका काल युद्धों का काल था, पर मंदिरों के विध्वंस की कुछ ही मिसालें मिलती है। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि स्थानीय सुबेदारों द्वारा संभल और अयोध्या में बनवाई गई मस्जिदें हिंदू मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई थीं। शायद उन्होंने कुछ मौजूदा मस्जिदों की मरम्मत कराई और फिर उन पर बाबर के सम्मान में शिलालेख लगवा दिए।

फारसो और अरबी में बाबर का पूरा दखल था। उसे तुर्की भाषा के, जो उसकी मातृभाषा थी, दो सबसे मशहूर लेखकों में गिना जाता है। गद्य लेखन में उसका कोई मानी नहीं है तथा उसका सुप्रसिद्ध संस्मरण तुजुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) विश्व साहित्य को अद्वितीय कृतियों में एक माना जाता है। उसकी दूसरी रचनाओं में एक मसनवो तथा एक सुप्रसिद्ध सूफ़ी ग्रंथ का तुर्की अनुवाद शामिल है। वह अपने समय के प्रसिद्ध कवियों और कलाकारों के संपर्क में था तथा अपनी तुजुक में उनकी कृतियों का वर्णन भी करता है। वह प्रकृति प्रेमी था और उसने खासे विस्तार के साथ भारत की वनस्पतियों और यहाँ के प्राणियों का वर्णन किया है। उसने बहते पानी से युक्त अनेक सुंदर बाग लगवाए और इस तरह उसने बागवानी की एक परंपरा कायम की।

बाबर ने राज्य की एक नई धारणा सामने रखी जो ताज की शक्ति और प्रतिष्ठा, धार्मिक और पथिक कट्टरता के त्याग तथा संस्कृति और ललित कलाओं के प्रोत्साहन पर आधारित थी। इस तरह वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक उदाहरण छोड़ गया और उनके लिए एक निश्चित दिशा निर्दिष्ट कर गया।

SOURCE : 

  • मध्यकालीन भारत_ राजनीति, समाज और संस्कृति_ आठवीं से सत्रहवीं सदी तक –Satish Chandra , ओरियंत ब्लैकस्वान , पृष्ठ संख्या- 203 से 205.
  • Picture Source: Wikipedia (link: https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Babur.2.jpg)
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