जीवन जीने के लिए पर्यावरण का महत्त्व एवं पर्यावरण के विभिन्न घटक


जीवन जीने के लिए पर्याणरण का महत्व  :

पर्यावरण का हमारे जीवन में बहुत महत्तों हैं । जीव चाहे किसी भी प्रकार के पर्यावरण में रहते हों उन सभी को अपनी उत्तरजीविता के लिए जीवन निर्वहन तत्वों की आवश्यकता होती हैं । जैसे सांस लेने के लिए वायु , पीने के लिए जल , खाने के लिए भोजन और आश्रय के लिए आवास (कृत्रिम और प्राकृतिक दोनों ) । ये सभी जीवन समर्थन और निर्वहन करने वाला तत्व हमें पर्याणरण ही प्रदान करता है । अगर एक बात में कहें तो पर्याबरण उन सभी भौतिक , रासायनिक एवं जैविक कारकों को समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी या पारितंत्रीय आबादी को प्रभाभित करती हैं तथा उनके रूप और जीवन जीविता को तय करती है । अब हम जानते हैं पर्याबरण के घटक ।

पर्यावरण के घटक :


साधारण रूप से पर्यावरण में अजैबिक (निर्जीव) और जैविक (सजीव) घटक होते हैं ।

 अजैविक (निर्जीव) घटक- 

जैसे- प्रकाश , वर्षण , जल, तापमान, वायुमंडलीय गैस , ऋतु या मौसम परिवर्तन आदि और

 जैविक (सजीव) घटक-

जैसे - पादप , मनुष्य , परिजीवि‌‍‍यों और सूक्ष्माजीवों आदि।

भौतिक घटक जैविक घटकों के उत्तरजीविता के लिए भौतिक घटक स्थितियां स्थापित करतें हैं जो बदले में पर्यावरण का रखरखाव का ध्यान रखते हैं । पर्याबरण के घटकों के बीच संबंध ऊर्जा के प्रवाह और पदार्थों के चक्रण के पथ है । उदाहरण के लिए हरे पादप अनिवार्य संसाधनों को भौतिक जगत से प्राप्त करते हैं - जल और खनिज मृदा से , कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल से और प्रकाश और ऊर्जा सूर्य से । जंतु पादपों तथा अन्य जंतुओं पर अपने भोजन के लिए थल और सागरों से प्राप्त करता है और भूपर्पट से खनिज और ईधन प्राप्त करता है । अब हम जानते हैं पर्याबरण के प्रकार ।


पर्यावरण के प्रकार :


सामान्य अर्थों में पर्यावरण हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैबिक तत्वों , तथ्यों , प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है । यह हमारे चारों और व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अंदर संपादित होती हैं तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करती हैं । तलाव का जल जिसमें मछली रहती हैं , तलाव का जल बाह्य पर्यावरण होगा । जल में पोषक, ऑक्सीजन तथा अन्य जीव होंगे जिनकी मछली को जीवन निर्वहन के लिए आवश्यक होती हैं । बाह्य पर्यावरण के विपरित , मछली के शरीर गुहा एक आंतरिक पर्यावरण प्रदान करती हैं जो बाह्य पर्यावरण से काफी अलग होता है । शरीर की सतह मछली के आंतरिक और बाह्य पर्यावरण के बीच में विनिमय अवरोधक का कार्य करती हैं । आंतरिक पर्यावरण के बीच में विनिमय अवरोधक का कार्य करती हैं । आंतरिक पर्यावरण बाह्य पर्यावरण के बीच में विनिमय अवरोधक का कार्य करती हैं । आंतरिक पर्यावरण बाह्य पर्यावरण की तुलना में अपेक्षाकृत स्थिर होता है । यद्धपि रोग और क्षति अथवा पर्याबरणीय तनाव भी इसे अव्यवस्थित कर सकती हैं । लेकिन जब अव्यवस्था के कारण को दूर कर दिया जाता है तो आंतरिक पर्यावरण अपनी मूल अवस्था में वापस आ जाता है । चूंकि मछली तालाब में रहती हैं  अतः ये उसका प्राकृतिक पर्यावरण है । तालाब के अजैविक कारक जैसे प्रकाश , तापमान , गहराई , पोषक और धुली हुई गैस , मछली के लिए जीवन निर्वाह के रासायनिक और भौतिक कारक प्रदान करता है । तालाब में रहने वाले अन्य सजीव जीव जैसे जीवाणु, कीट, कृमि , मृदुकबची जीव और जलीय बनस्पतियां मछली के लिए भोजन हों सकती हैं । थल/भूमि पर ऐसे प्राकृतिक पर्यावरण के उदाहरण में वन , घास के मैदान , सवाना और मरुस्थल शामिल हैं । पर्यावरण के कुछ ऐसे घटक भी हैं जो मनुष्य द्वारा निर्मित किए गए हैं जैसे खेत , शहर और औद्योगिक क्षेत्र । एक सबसे महत्तपूर्ण घटक - जल को सरिताओं से सीधे नहीं लिया जाता बल्की पहले उसका निस्पंदन और सोधन करके फिर पीने तथा अन्य नगरपालिका के कार्यों के लिए उपयोग किया जाता हैं । उपापचयी अपशिष्ट और कचरे को स्थानीय रूप से निस्तारित नहीं किया जाता हैं बल्कि सुदूर स्थानों पर, शहर से दूर उपचार अथवा सन्निक्षेपण के लिए ले जाया हैं । शहरों में आमजन के लिए भोजन अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों से आता है । मनुष्य द्वारा निर्मित किया गया पर्याणरण अत्यधिक मात्रा में पदार्थों और ऊर्जा का उपयोग करता है और इसके लिए देखरेख, निगरानी और प्रबंधन आवश्यक होता है ।




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