Sunday, July 18, 2021

जैविक विविधता अधिनियम (कानून), 2002 - The Sky Journal

भारत के पास जैविक संसाधनों की प्रचुरता और उससे संबंधित स्थानीय ज्ञान की एक अछी जानकारी उपलब्ध हैं । जैबिक विविधता अधिनियम का जैविक संसाधनों की उपलब्धि नियंत्रित कराना जिससे उनके प्रयोग का उत्पन्न लाभ का समानांतर वितरण हों सके । जैबिक विविधता विधेयक संसद में 15 मई, सन् 2000 को प्रस्तावित हुआ था । उसे निरीक्षण के लिए संसद के विज्ञान , तकनीकी , पर्याबरण और वनों की समिति को भेज दिया गया था । साक्ष्यों और सबूतों के परिक्षण के पश्चात् स्थायी समिति ने इस विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ पारित कर दिया था। इस आयोग द्वारा दिए गए सुझावों पर आधारित सरकारी प्रस्ताव को मंत्रालय (कैबिनेट) ने स्वीकृति दी। जैविक विविधता विधेयक 2002 को लोकसभा ने सन् 2 दिसम्बर 2002 को और राज्यसभा ने 11 दिसम्बर सन् 2002 को पारित किया था।

जैवविविधता कानून की मुख्य विशेषताएँ-

इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारत की प्रचुर जैवविविधता का संरक्षण व विदेशी व्यक्तियों व संगठनों द्वारा हमारी जानकारी का बिना पर्यावरण रक्षा नीतियाँ एवं प्रक्रियाएँ अनुमति के प्रयोग को रोकना है। यह नीति जैविक संपदा की लूट को रोकने के लिए भी बनाई गई है । यह कानून जैवविविधता अधिकार बोर्ड (National Biodiversity Authority; NBA), राज्य जैवविविधता बोर्डों (State Biodiversity Bonds, SBBs) और जैवविविधता प्रबंधन कमेटियों (Biodiversity Management Committees, BMC) के स्थानीय आयोग में स्थापित करना है। जैविक संसाधनों व संबंधित ज्ञान के प्रयोग के निर्णयों में एन.बी.ए. और एस.बी.बी. का बी. एम. सी. से सलाह करना आवश्यक है। बी.एम.सी. की भूमिका जैविक विविधता के आंकन, संरक्षण व सम्पोषित प्रयोग करवाना है।

सब विदेशी नागरिकों व संगठनों के लिए यह अनिवार्य है कि जैविक संसाधनों के प्रयोग के लिए उन्हें एन. बी. ए. की पूर्व अनुमति लेनी पड़ेगी। भारतीय व्यक्तियों/संगठनों को भी यदि विदेशी व्यक्तियों या संगठनों के साथ या तो कोई अनुसंधान करता है अथवा कोई जैविक संसाधनों का आदान-प्रदान करता है, तो उन्हें एन.बी.ए. की अनुमति लेनी पड़ेगी। सहभागी अनुसंधान योजनाओं व ज्ञान और साधनों के आदान-प्रदान आमतौर से उस स्थिति में कर मुक्त होती हैं, जब उनकी कार्यशैली केंद्रीय सरकार के निर्देशों के अनुरूप हो या जब वे संरक्षण, सम्पोषित प्रयोग व लाभ के सही वितरण जैसे अच्छे उद्देश्य रखते हों। परन्तु भारतीय मूल के नागरिकों व स्थानीय व्यक्तियों की इनमें वैद्य और हकीम भी शामिल हैं, भारत के अंदर जैविक साधनों के प्रयोग की पूरी स्वतंत्रता है विशेषकर जब वह औषधीय व अनुसंधान के उद्देश्यों के लिए प्रयोग हो ।

स्वीकृति देते समय, एन. बी.ए., उन शर्तों को सामने रखेगी जो कि लाभों का सही वितरण कर सके । भारत के अंदर या बाहर, किसी भी रूप में आई.पी. आर. (Intellectual Property Rights, बौद्धिक सम्पत्ति का अधिकार) के आवेदन अथवा किसी जैविक स्रोत पर आधारित नवीन यंत्र को प्राप्त करने के लिए, एन. बी. ए. की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। पारंपरिक ज्ञान के बचाव के लिए इस कानून में एक प्रावधान है। एन. बी.ए. द्वारा स्वीकृतियों के परिणामस्वरूप आर्थिक मुनाफे, फीस, इत्यादि को राष्ट्रीय जैवविविधता कोष (NationalBiodiversity Fund, NBF) में जमा किया जाता है, जहाँ से वह स्थानीय सरकार से सलाह

करके उन क्षेत्रों के संरक्षण और विकास के लिए प्रयोग किया जाता है, जहाँ से यह संपदा खोजी गई थी। स्थानीय सरकारों के राज्य सरकारों के गठबंधन के अंतर्गत, जैवविविधता के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय परंपरा स्थलों (National Heritage Sites ) के अधिसूचना की पहचान की जाती है। इसके अलावा अन्य पदार्थों के अधिसूचना की भी व्यवस्था है, तथा कुछ क्षेत्रों में कर, इत्यादि की माफी भी है। इसका उद्देश्य सामान्यतया व्यापारिक पदार्थों को कर मुक्त करना है, ताकि वे व्यापार प्रणाली में रुकावट न सिद्ध हो ।'यह विधेयक केंद्रीय और राज्य बोर्डों और स्थानीय कमेटियों की तीन स्तर की व्यवस्था माध्यम से न केवल जैविक संपदा की लूट को रोकने में सहायक है, बल्कि वह स्थानीय किसानों और जैविक विविधता का भी संरक्षण करता है। ये पौधों एवं पशुओं की जनन संसाधनों तक पहुँच को नियंत्रित करते हैं और लाभों का सही वितरण करते हैं। विदेशियों द्वारा पहुँच के सब मामले प्रस्तावित राष्ट्रीय जैविक विविधता अधिकार समिति द्वारा संबोधित होगे। भारत की किसी भी पारंपरिक जानकारी अथवा जैविक साधन पर आधारित नई रचना के बौद्धिक संपत्ति अधिकार को प्राप्त करने के लिए इस आयोग की आवश्यकता होगी। यह आयोग अन्य देशों में ऐसे अधिकार प्रदान करने का विरोध करेगा। एन. बी. ए. एक नागरिक अदालत की भूमिका निभाएगा। इसके अतिरिक्त केंद्र उस स्थिति में राज्यों को निर्देश जारी करेगा, जहाँ उसे महसूस होता है कि प्राकृतिक रूप से सम्पन्न किसी क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा उपयोग के कारण खतरा उत्पन्न हो गया है ।


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